पांचवा अध्याय
देखा जाये तो मैं प्रेम समझता तो था .." लेकिन परिभासित नहीं कर पाया था.. शायद प्रेम बिषय ही नहीं परिभासित करने की ,, लेकिन शब्दों का महत्व इसमें भी है ... हमारे संसकारो का महत्वा इसमें भी है ..'' हमारे संस्कार वो होते है .. जिन्हे हम देख के बड़े होते है .. जिस माहौल में हम बड़े होते है ... उनसे सबकुछ सीखना संभव तो नहीं ... लेकिन जैसे भोजन लेते ही वो हमारे मस्तिष्क का अंग बन जाता है और फिर धीरे -धीरे विचारो का स्थान ले लेता है ठीक उसी तरह होते है हमारे संस्कार जो हमें हमारे माता -पिता और हमारे समाज से हमें मिले होते है | अगर इनमे प्रेम नहीं होता तो हम प्रेम को समझते हुए भी परिभासित नहीं कर सकते | अधूरा ज्ञान विनाश का कारन होता है ,, जो सिर्फ विचार हो उसे शब्द ना मिल पाए | मेरे साथ भी ऐसा ही हो सकता था | लेकिन मुझे मेरी माँ संभालती रही | वो प्रत्यक्ष नहीं थी मेरे पास | लेकिन मेरे संस्कारो में थी | संभव है इसी से मुझे प्रेम का भान तो था ,, लेकिन परिभासित कैसे करे इसका ज्ञान ना था | एक रात जब मैं अपनी घर से कोसो दूर निकल आया था ..... उनसे बहोत दूर जो मेरे अपने होने का दिखावा भर करते थे ...... और माघ की सर्दियों के चादर में लिपटा मैं शुन्य में खोया था ... तब शायद मैंने तलाश की थी प्रथम बार प्रेम की | उस स्पर्श की जो सिर्फ और सिर्फ मेरी माँ ही मुझे दे सकती थी | रात भर वो ठिठुरन वाली शर्दी मुझे कपाति रही | विचार करवट पर करवट ले रहे थे | शरीर निढाल सा पड़ा था खुले मैदान में ,, मैं ऐसा जैम गया था की ... मुझे आश्चर्य ना होगा अगर मुझे किसी ने लाश समझ लिया हो | एक १६ साल का लड़का जब घर छोड़ता है | ऐयाशिया कारण नहीं होती | अपनत्वा की कमी होती है | सुबह की धुप ने मुझे सींचा पहले फिर उठाया |
वो भी मेरी माँ ही थी | मैं उठा चाय की टप्परि पे गया | जाने कितने सिक्के थे कुछ याद नहीं | रिश्ते एक भी ना थे इतना भर याद है | सुबह में पेपर डाले | दोपहर में जिंदगी का हिसाब करने बैठा ... गवाने जैसा तो कुछ भी न था ...... तब शायद मेरी उम्र पेपर पढ़ने की थी ... लोगो के घरो में डालने की नहीं ..... जिन दुकानों में मैंने .... एक प्रिंटर पे काम किया वहां भी अपनी जिंदगी में रंग ना भर पाया तो कैसे परिभासित कर पता अपने जीवन को और उसमे छुपे प्रेम को |||
मैं उस पेपर और प्रिंटर में घिस घिस कर खोखला हो रहा था या उभर रहा था कुछ खबर नहीं थी | उम्र कच्ची थी ,, तजुर्बे बड़े लेने थे || रोटी खाने को पैसे जेब में ना थे ऐसा भी वक़्त गुजरा है || गुजरा है वो वक़्त भी जहाँ से सोच रहा था अब जीवन का मतलब ख़तम हो चूका है तो चलो अब अलविदा कहते है ... इस संसार को .... लेकिन आगे बढ़ ही ना पाया ... ये भरम तब भी रहा की ... आज जी के देख लेते है क्या पता अब भी जिंदगी गले लगा ले और आज भी है की जिंदगी एक दिन गले लगा लेगी | इसी भरम में तुम मिले | भरम तो अब भी बना है ... लेकिन अब वो यकीं में बदल गया है .... बस अब ये यकीं बना रहे इतना भर का तुम्हारा साथ चाहता हूँ | मैं तुमसे और कुछ नहीं चाहता बस इतना करना की .... मेरा ये भरम एक दिन यकीं में बदल जाये .. तुम्हारा आना एक बार फिर कर गया है ठूठ बृक्ष को हरा -भरा ||
ऐसा करने से तुम सिर्फ मेरा भला ना करोगी अपितु उन सारे लोगो का कुछ हित कर पाओगी जो भटक रहे है और ढूंढ रहे है खुद को .... जिनका बिश्वाश टुटा है ... और उनका भी भला कर पाओगी जो झूठे भरम में जी रहे है ........ मेरा पूरा योगदान खुद को समझने में रहा तो तुम मुझे सबको समझाने में अपना योगदान दो ..... अभी भी कई मेरी तरह है ..... जिनका नाम "अंकित" ना हो लेकिन जिंदगी मेरी ही जी रहे है उन्हें मिलेगा सबेरा तुम्हारे शब्दों से और मेरी आँखों में सूखे उन आसुंओं से .... जो मरुअस्थल हो चुके है ............ लेकिन काफी है ठहराव के लिए ...... पाँव जम जाये तो ... छाँव ढूंढे ... ए,, जिंदगी बता तू कितनी जमी देगी ... मुझे खड़ा होने को ....... मैं चिर के सीना ... अपना स्थान बना लूंगा ...इस धरा में जन्मा हूँ जनता हूँ .... जमी का मतलब ..... मैं इस खुले आकाश में अपना एक आसमा बना ही लूंगा .... ऐ जिंदगी बता तू कितनी जमीं देगी ||
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