चौथा अध्याय
अब जब मैं संभालना सिख गया हूँ और सिख रहा हूँ अब ..... पढ़ना ज़िंदगी को ..... तो सोच रहा हूँ पढ़ना सिख लूँ मैं तुम्हे ही ........ क्योकि मेरी ज़िंदगी तो तुम ही हो | मैं तुम्हे जितना पढ़ पाया हूँ और तुम्हे जितना खुद को समझा पाया हूँ ....... उतना काफी नहीं है .... एक सफल जीवन के लिए ............ मैं चाहता हूँ मेरा इतिहास मेरा और मेरा आज तुम सब पढ़ो और मुझे जान पाओ......... मेरे प्रेम को पढ़ पाओ जो सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे लिए है |
तुम जानती हो ,, जब मैं पारिजात के पुष्पों को समेट कर अपनी हथेलियों में लेता था ,, दरहसल तब मैं समेटता था खुद को तुम्हारे लिए ....और रख देना चाहता था खुद को तुम्हारी हथेलियों पर | लेकिन मैं ये सब कभी कहने में समर्थ ना रहा |
तुम भी तो ना कह पाई ...... तुम्हारे मन में जो अथाह प्रेम रहा मुझे लेकर ...... तुम कहाँ व्यक्त कर पाई उसे ...... वैसे जैसे तुम करना चाहती हो | लेकिन मैंने पढ़ लिया तुम्हे .... तुम्हारे ह्रदय को .... और जान पाया की वो जो मेरी माँ ने बरगद के पेड़ लगाए थे| उसके किनारे -किनारे गुलाब निकल आये है ...... ताकि जब मैं उस बरगद के पेड़ निचे अपना बचपन ढूँढू तो मुझे वहाँ वो गुलाब मिले ..... मेरी आत्मा की सुगंध को फिर से महकने को ....... और वो गुलाब तुम हो | |
तुम मुझे उस शिशु के तरह रखना चाहती हो जो अभी - अभी जन्मा हो | और झूलना चाहती हो मुझे तुम उस पालने में जो कभी मेरी माँ ने अपने ख्वाबो में सहेजे थे | जब उन्होंने प्रथम बार मुझे गोद में लिया था |
एक पुरुष पिता न बन पाए परन्तु एक स्त्री के ह्रदय में माँ का ममत्व बहोत महत्व रखता है | स्त्री बिखरे को समेट सकती है | एक मुर्दे में जान डाल सकती है | शायद इसलिए इस प्रकृति को स्त्री की उपाधि दी गयी है || मैं नहीं जनता की क्यों पुरुष अपने यथार्थ को छुपाते है | क्यों वो नहीं रोते या कह पाते अपने ह्रदय के भाव को ,,,,,,, लेकिन मैं इतना जनता हूँ पुरषो की आत्मा रुदन करती हैं जब उन्हें नहीं मिल पाता वो प्रेम जो उन्हें स्त्री का महत्वा बता सके | मैं बनना चाहूंगा स्त्री अगर तुम स्वीकार कर लो पुरुष बनना | मैं कोइ इतिहास बदलने की चाह नहीं रखता हूँ | बस मैं एक माँ बनकर अपनी माँ को खुद पाना चाहता हूँ ........ अपने भीतर अपनी आत्मा में | सुनो तुम साथ दोगी मेरा ||
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