प्रथम अध्याय
सुनो,,
मैं जब भटक रहा था इधर - उधर और तलाश रहा था अपने होने का महत्व उस क्षण तुम नहीं थे मेरे पास ..जब मैं अपने भीतर की कोलाहल को छुपाने को बाहर की और ढूंढ रहा था शांति,, तब तुम नहीं थे मेरे पास .. मैं मनुष्य हूँ मुझमे भी जीवन बस्ता है .. मैं जीवित हूँ , मुझमे भी शांति चाहिए थी और वो शोर से काफी दूर होनी चाहिए थी ||
बाहर के कोलाहल से दूर नहीं अंदर के कोलाहल से ..... जो मैं अपने अंदर लिए जाने कब से .. इधर - उधर भटक रहा था .. लोगो से पूछ रहा था अपने होने का मतलब .... कमरों के ख़ाली दीवारों से बाते आकर रहा था ... तब कही तुम्हारा मेरे जीवन में आना ,, ठीक वैसा ही रहा जैसे .. एक अशोक का बृक्ष अपने जन्म से मरण तक गुलमोहर के लाल फूलो को अपनी डालियों में सजे हुए देखने की प्रतीक्षा में हो ..
मैं राह तक रहा था, एक ऐसे की जो मुझे मेरी सांसो की गति से समझ ले, मेरी उँगलियों के नसों से मेरी सोच को पहचान ले, जो मेरी बंद आँखों से ये जान ले की मैं चिंतित हूँ या निद्रा की अवस्था में हूँ , जो मेरी फीकी मुस्कान में मेरे दर्द को पहचान ले, मैं ढूंढ रहा था उसे , जो समझे मुझे ना की मुझे, समझाएं ||
मैं जब छत की वो सफ़ेद दीवारों से ऊब जाता और .. निकलता तलाशने खुद को तो मैं .. ढूंढ़ता खुद को पेड़ के हर एक पत्ते में , बिखरते बनते बदलो में , उन सूखे फूलों में जो टूट का डालियों से रुदन करती रहती थी ,और सजना चाहती थी किसी स्त्री के केशो में उसके प्रियतम द्वारा ,, वो सूखे फूल हरी के चरणो से लिपट कर जैसे अपने अपराधों का आकलन करना चाहते थे ठीक वैसे ही मैं भी किसी अपने के कंधे से लग कर अपने आसुंओं का आकलन करना चाहता था और दूर कही उन्हें क्षितिज के उस पार छोड़ आना चाहता था .. की वो मेरे आँखों और पलकों से दूर से दूर हो जाये ||
लेकिन मैं खुद को असहाय और असमर्थ महसूस कर रहा था | अपने जीवन को तलाशता मैं जब टकराया तुमसे ,, तो कोइ कहानी बननी जैसे मुझे दिखी नहीं ... मैं खुद भी कोइ कहानी नहीं बनाना चाहता था | मैं तो बस एक शिशु की भांति अपनी माँ को तलशता भटक रहा था | मैं प्रवाशी हो गया था ,, अपनी ही आत्मा के शहर से दूर था मैं |
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