पांचवा अध्याय देखा जाये तो मैं प्रेम समझता तो था .." लेकिन परिभासित नहीं कर पाया था.. शायद प्रेम बिषय ही नहीं परिभासित करने की ,, लेकिन शब्दों का महत्व इसमें भी है ... हमारे संसकारो का महत्वा इसमें भी है ..'' हमारे संस्कार वो होते है .. जिन्हे हम देख के बड़े होते है .. जिस माहौल में हम बड़े होते है ... उनसे सबकुछ सीखना संभव तो नहीं ... लेकिन जैसे भोजन लेते ही वो हमारे मस्तिष्क का अंग बन जाता है और फिर धीरे -धीरे विचारो का स्थान ले लेता है ठीक उसी तरह होते है हमारे संस्कार जो हमें हमारे माता -पिता और हमारे समाज से हमें मिले होते है | अगर इनमे प्रेम नहीं होता तो हम प्रेम को समझते हुए भी परिभासित नहीं कर सकते | अधूरा ज्ञान विनाश का कारन होता है ,, जो सिर्फ विचार हो उसे शब्द ना मिल पाए | मेरे साथ भी ऐसा ही हो सकता था | लेकिन मुझे मेरी माँ संभालती रही | वो प्रत्यक्ष नहीं थी मेरे पास | लेकिन मेरे संस्कारो में थी | संभव है इसी से मुझे प्रेम का भान तो था ,, लेकिन परिभासित कैसे करे इसका ज्ञान ना था | एक रात जब मैं अपनी घर से कोसो दूर निकल ...
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चौथा अध्याय अब जब मैं संभालना सिख गया हूँ और सिख रहा हूँ अब ..... पढ़ना ज़िंदगी को ..... तो सोच रहा हूँ पढ़ना सिख लूँ मैं तुम्हे ही ........ क्योकि मेरी ज़िंदगी तो तुम ही हो | मैं तुम्हे जितना पढ़ पाया हूँ और तुम्हे जितना खुद को समझा पाया हूँ ....... उतना काफी नहीं है .... एक सफल जीवन के लिए ............ मैं चाहता हूँ मेरा इतिहास मेरा और मेरा आज तुम सब पढ़ो और मुझे जान पाओ......... मेरे प्रेम को पढ़ पाओ जो सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे लिए है | तुम जानती हो ,, जब मैं पारिजात के पुष्पों को समेट कर अपनी हथेलियों में लेता था ,, दरहसल तब मैं समेटता था खुद को तुम्हारे लिए ....और रख देना चाहता था खुद को तुम्हारी हथेलियों...
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तीसरा अध्याय हाँ ,, ऐसा ही होगा .......... अब जब हम नहीं के दो किनारे मिल चुके है तो उन पुरानी यादों में जाना नहीं चाहता | तुम भी तो नहीं चाहतीं की मैं उस पुराने मोड़ से गुजरू | सच कहूं तो अपना गुजरा कल जीना उतना मुश्किल नहीं होता जितना मुश्किल हो जाता है उसे पुनः स्मरण करना ,, ये ऐसा हैं की .... खुद के हाथों ... खुद के घाव को फिर से चोटिल कर रहे हो ......... किसी के मरहम के लिए पुनः नासूर को जन्म देना क्या उचित है ........ क्या प्रेम स्पर्श पाने को खुद का लाचार दिखाया जाना क्या उचित है ......... भ्रम है | तुमसे मिल के जाना हमने | जिसको प्रेम होगा वो कभी आपके वो दर्द नहीं कुरेदेगा जिससे आपको दर्द हो ... क्योकि तब उसे आपसे जायदा तकलीफ़ होगी | प्रेम पाने को कभी लाचारगी ना दिखाना ही श्रेष्तम प्रेम पाना है | अब मैं जान गया हूँ | जब मैं बचपन में बुढ़ापा जिया करता था ......... अपने ही घर में मेरे नन्हे हाथो में जब बुढ़ापे की लाठी मुझे मिली थी ....... तब सायद मैं उसी को जीवन मान चूका था | माँ का स्पर्श तो...
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दूसरा अध्याय अब जब तुम मिल गए हो तो मैं,, मेरी कहानी शुरू हो इस से पहले मैं हमारी कहानी की शुरुआत करना चाहता हूँ | जब मैं तुमसे मिला , तब मैं जीना सिख रहा था | तुम भी तो जीना सिख रही थीं | हमदोनो अलग -अलग शहर में प्रवासियों की भांति भटक रहे थे | एक दूजे की तलाश में | ये वो दौर था जब तुम खुद में मुझे तलाश रही थी और मैं तुमको ढूंढ रहा था | हम दोनों की आत्मा की रुदन को सुना इस प्रकृति ने और मिलाया हमें | अब मैं अशोक का बृक्ष गुलमोहर में परिवर्तित होने वाला था और तुम मुझपे सजने वाली थी उस सुर्ख़ लाल पुष्पों की भातिं | सच कहूं तो अगर तुमने मुझे ना ढूंढा होता तो मैं शायद खुद को भी ना ढूंढ पाता | तुम्हारा मुझे इस तरह एक भीड़ से ढूंढ के निकालना ,........ मुझे एक चमत्कार की तरह लगता है | जो इस आश्चर्य की सिमा से परे हो | कभी -कभी ल...
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प्रथम अध्याय सुनो,, मैं जब भटक रहा था इधर - उधर और तलाश रहा था अपने होने का महत्व उस क्षण तुम नहीं थे मेरे पास ..जब मैं अपने भीतर की कोलाहल को छुपाने को बाहर की और ढूंढ रहा था शांति,, तब तुम नहीं थे मेरे पास .. मैं मनुष्य हूँ मुझमे भी जीवन बस्ता है .. मैं जीवित हूँ , मुझमे भी शांति चाहिए थी और वो शोर से काफी दूर होनी चाहिए थी || बाहर के कोलाहल से दूर नहीं अंदर के कोलाहल से ..... जो मैं अपने अंदर लिए जाने कब से .. इधर - उधर भटक रहा था .. लोगो से पूछ रहा था अपने होने का मतलब .... कमरों के ख़ाली दीवारों से बाते आकर रहा था ... तब कही तुम्हारा मेरे जीवन में आना ,, ठीक वैसा ही रहा जै...