तीसरा अध्याय 

 

 

 

हाँ ,, ऐसा ही होगा .......... अब जब हम नहीं के दो किनारे मिल चुके है तो उन पुरानी यादों में जाना नहीं चाहता | तुम भी तो नहीं चाहतीं की मैं उस पुराने मोड़ से गुजरू | सच कहूं तो अपना गुजरा कल जीना उतना मुश्किल नहीं होता जितना मुश्किल हो जाता है उसे पुनः स्मरण करना ,, ये ऐसा हैं की .... खुद के हाथों ... खुद के घाव को फिर से चोटिल कर रहे हो ......... किसी के मरहम के लिए पुनः नासूर को जन्म देना क्या उचित है ........ क्या प्रेम स्पर्श पाने को खुद का  लाचार दिखाया जाना क्या उचित है ......... भ्रम है | तुमसे मिल के जाना हमने | जिसको प्रेम होगा वो कभी आपके वो दर्द नहीं कुरेदेगा जिससे आपको दर्द हो ... क्योकि  तब उसे आपसे जायदा तकलीफ़ होगी | प्रेम पाने को कभी लाचारगी ना दिखाना ही श्रेष्तम प्रेम पाना है |

 

 अब मैं जान गया हूँ | जब मैं बचपन में बुढ़ापा जिया करता था ......... अपने ही घर में मेरे नन्हे हाथो में जब बुढ़ापे की लाठी मुझे मिली थी ....... तब सायद मैं उसी को जीवन मान चूका था | माँ का स्पर्श तो मैंने महसूस तक ना किया | ब्याह के घर  पिता की पत्नी आई ,, मेरे पिता के दो पुत्र ........ मेरा कोइ नहीं मैं अकेला | मैं अकेला अपने ह्रदय में अपने बचपन को मारते गया|


मेरी माँ ने शायद सुनी होगी मेरी हर रोज की सिसकियाँ | पढ़ा होगा मेरे जीवन का ख़ालीपन | वो भी बिलखती होगी कहीं ......... उसकी आँखों के पानी ने मुझे सींचा है | जब भी मैं उदाश होता तो आँगन से लगे उस बरगद के पेड़ से लिपट के रोता ,, जिसे मेरी माँ ने लगाया था ........ वो बरगद का पेड़ मेरी माँ का अंचल था ....... उसके पत्ते मुझे पंखा झलते ........ मुझे प्यार से झूला झुलाते...... ठीक वैसे ही  .... जैसे एक माँ अपने बच्चे को पालने में लोरियां गाते हुए प्यार से वो पालना झुलाती है | मैंने महसूस किया है ....... माँ तुम्हारा स्पर्श उस बरगद के पेड़ में ...... ढलते शाम में सुना हैं मैंने .... करुण रुदन ....... तुम भी बिलखती थी अपने बेटे के लिए ........ मुझे एहसास है ....... मैं तुम्हारी छाया से लग के बड़ा हुआ हूँ | मैं शुक्रिया करता हूँ अपनी जननी का जिन्होंने मुझे प्रेम करना सिखाया | मैं शुक्रिया करता हूँ अपने पिता की पत्नी "मेरी आत्मा को रौंदने के लिए" ये सायद जरुरी था ........... क्योकि तभी शायद मैं सच्चा प्रेम समझ पाया  हूँ | और मैं शुक्रिया करना चाहता हूँ उन सभी लोगो का जिन्होंने मुझे ठुकराया | क्योकि "जरुरी है ठोकर खाना भी.... संभालना सिखने के लिए "....    

 

 मैं अब संभलना सिख गया हूँ |  और संभालना भी सिख गया हूँ | मेरा बचपन मुझसे छीन गया लेकिन जो परिपक्वता मुझमे जन्मी वो जीवन के अंतिम छोर तक मुझमे रहेगी ||

 

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