दूसरा अध्याय
अब जब तुम मिल गए हो तो मैं,, मेरी कहानी शुरू हो इस से पहले मैं हमारी कहानी की शुरुआत करना चाहता हूँ | जब मैं तुमसे मिला , तब मैं जीना सिख रहा था | तुम भी तो जीना सिख रही थीं | हमदोनो अलग -अलग शहर में प्रवासियों की भांति भटक रहे थे | एक दूजे की तलाश में | ये वो दौर था जब तुम खुद में मुझे तलाश रही थी और मैं तुमको ढूंढ रहा था | हम दोनों की आत्मा की रुदन को सुना इस प्रकृति ने और मिलाया हमें | अब मैं अशोक का बृक्ष गुलमोहर में परिवर्तित होने वाला था और तुम मुझपे सजने वाली थी उस सुर्ख़ लाल पुष्पों की भातिं | सच कहूं तो अगर तुमने मुझे ना ढूंढा होता तो मैं शायद खुद को भी ना ढूंढ पाता | तुम्हारा मुझे इस तरह एक भीड़ से ढूंढ के निकालना ,........ मुझे एक चमत्कार की तरह लगता है |
जो इस आश्चर्य की सिमा से परे हो | कभी -कभी लगता है जो मेरे साथ गुजरा या जो तुम्हारे साथ गुजरा वो दोनों समय मिलकर ना दिन हुए ना रात हुए , वो शाम में ढल गए और फिर हमारी चांदनी रात ........ एक ऐसी शीतल रात जो बनी ही हो चकोर को उसकी चकोरी से मिलाने को ........
या यूँ कहूं तो .... हमारे आँखों के बहते समंदर को टकराना ही था और बनना था उसे मीठी पानी की नदी ... एक ऐसी नदी जो हमारे बर्षो के आसुंओं को खुद पी जाये और हमें दे एक मीठा एहसास ......
तब मैं तुम्हारे बारे में बस इतना जानता था की ....तुम्हारी खनकती हसीं में कही न कही एक आसुओं का छुपा सैलाब भी है ,, कारन नदारत था लेकिन ....... नहीं पता था मुझे की आँखे उदाश क्यों है तुम्हारी ? हम दोनों अलग - अलग उस ठूंठ बृक्ष के समान थे जो बस जिन्दा थे और जिन्हे पकड़ के कोइ बस ठहर सकता था , लेकिन जीवन नहीं बसाया जा सकता था | वहाँ चिड़ियों की चहचहाट नहीं हो सकती थी | कोइ राही ठहर के मीठी छाव नहीं ले सकता था |
लेकिन जब हम मिले तो वो दो ठूंठ बृक्ष एक हरे - भरे गुलमोहर में परिवर्तित हो गए ...... मैं गुलमोहर और तुम मेरे बाँहों की डालियों में सजने वाली पुष्प | अब इस घने बृक्ष के डालियों में चिड़ियों का घोसला होगा , राहगीरों का बसेरा होगा | अब मैं तुम्हारे और अपने दोनों के आसुओं को क्षितिज के उस पार छोड़ आऊंगा | हाँ यही होगा , ऐसा ही होगा |
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